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वास्तु अनुसार भवन निर्माण

 दोस्तों नमस्कार, हमारे वेब पोर्टल पर आपका स्वागत है, हम अपने इस पोर्टल पर Technology और Education  से संबंधित लेख लिखते हैं। आज की इस पोस्ट में हम भवन निर्माण और वास्तु कला से सम्बंधित जानकारी आपके लिए लेकर आये हैं। ऐसा नहीं है की पूरी दुनिया में भवन निर्माण वास्तु के अनुसार ही हुए हैं। लेकिन हमारे देश में ज्यादातर लोग वास्तु को मानते हैं। ये लेख उन्ही लोगों के लिए है जो वास्तु शास्त्र में विश्वास करते हैं। तो आइये बात करते हैं की वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन निर्माण करते वक़्त किन-किन बातों पर आपको गौर करना होगा, क्या ऐसी चीजें है जो घर बनाते वक़्त किस दिशा में बनानी है या किस दिशा में नहीं बनानी। 

वास्तु एवं निर्माण

वास्तु शास्त्र विज्ञान को समझने और उससे फायदा उठाने के लिए सर्वप्रथम आपको दिशाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है। इसे इस तरिके से आप समझ सकते हैं  की जब आप पूर्व दिशा की ओर मुंह करके खडे़ होते हैं तो आपके बाईं/Left ओर उत्तर और दाहिनी/Right ओर दक्षिण होती है और आपकी पीठ के पीछे/back पश्चिम दिशा होती है। जहां कोई भी दो दिशा मिलती हैं, वह कोण बेहद महत्वपूर्ण होता है जैसे- पूर्व-उत्तर, पूर्व-दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, उत्तर-पश्चिम आदि।  यह कोण महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह दोनों दिशाओं से आने वाली शक्तियों और ऊर्जाओं का मिश्रण कर देता है। उत्तर-पूर्व के बीच वाले कोण को ईशान कोण कहते हैं। पूर्व-दक्षिण के बीच वाले कोण को आग्नेय कोण कहते हैं, दक्षिण-पश्चिम के बीच वाले कोण को नैऋत्य कहते हैं, पश्चिम-उत्तर के बीच के कोण को वायव्य कोण कहा जाता है। इन सभी दिशाओं के मध्य स्थान को ब्रह्म स्थान के रूप में जाना जाता है।

मानव जीवन में सफलता को प्राप्त करने में सबसे ज्यादा भूमिका मनुष्य की शुभ उर्जा, निरंतर सतत प्रयास, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास और अपने आस-पास निवास का वातावरण व उसकी अदृश्य उर्जा का प्रभाव होता है। अगर आप भवन निर्माण कर रहे हैं तो उस समय वास्तु-सम्मत निर्माण कराया जाये तो घर का हर भाग आपको शुभता और वास्तु देवता के आशीर्वाद से आप सदैव सफलता प्राप्त करेंगे। ब्रहमांड तथा भू गर्भ से आने वाली आलोकिक व सकारात्मक उर्जा का सही समन्वय ही जीवन के हर क्षेत्र में तथा भाग्योदय में आपके लिए सहायक होता है। 

वास्तु के कुछ प्रमुख सूत्र जिन्हे अपनाकर आप वो आलोकिक ऊर्जा पा सकते है। 

प्रथम सूत्र : सबसे पहले बात करते हैं पूर्व दिशा की जो हमें सौर्य/सूर्य ऊर्जा प्रदान करती हैं, क्यूंकि यहीं से सूर्य का उदय होता है। सूर्य जिसे शास्त्रों में इस सम्पूर्ण सृष्टि का प्राण, मनुष्य की आत्मा और सामाजिक प्रतिष्ठा, यश, बल, ऐश्वर्य व मान का प्रदाता माना गया है। इसलिए भवन निर्माण करते वक़्त ये ध्यान रखें की इस दिशा में ज्यादा से ज्यादा खुला स्थान रखना चाहिए। इस दिशा में भूमि को निचा होना चाहिए साथ ही अधिक से अधिक दरवाजे, मुख्य प्रवेश द्वार, खिडकियां, उपवन, रोशनदान, बागीचा, बरामदा, बालकनी इत्यादि सभी पूर्व दिशा में बनाना वास्तु शास्त्र अनुशार उपयुक्त माना गया है। 

द्वितीय सूत्र : पूर्व दिशा के बाद बात करते हैं उत्तर दिशा की, वास्तु अनुसार उत्तर दिशा में उत्तरी ध्रुव/North Pole होने के कारण चुम्बकीय तरंगों का भवन में प्रवेश होता हैं। इन चुम्बकीय तरंगों का परवाह सम्पूर्ण भवन में रहे इसलिए इस दिशा में भी खुला स्थान रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है की ये चुम्बकीय तरंगे हमारे शरीर में बहने वाले रक्त संचार एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। मनुष्य जीवन में स्वास्थ्य ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। स्वस्थ जीवनयापन की दृष्टि से इस दिशा का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को माँ लक्ष्मी और कुबेर की दिशा कह कर समान्नित किया गया है। यह दिशा अपने प्रभाव से स्वास्थ्य के साथ ही यह धन-लाभ व अन्य प्रकार की आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करती हैं। इस दिशा में जल क्षेत्र बनाया जाना लाभ देने वाला माना गया है। 

तृतीय सूत्र : पूर्व और उत्तर दिशा के मिश्रण से बनी दिशा को भी वास्तु शास्त्र में बहुत महत्व दिया गया है। इस दिशा को ईशान कोण के नाम से जाना जाता है। वास्तुशास्त्र में इसे विशेष शुभ व लक्ष्मी के द्वार की संज्ञा दी गई है। यही कारण है की उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात ईशान कोण में देवी-देवताओं का स्थान होने की बात वास्तु शास्त्र में कही गई है। ईशान कोण में चुम्बकीय तरंगों के साथ-साथ सौर ऊर्जा भी मिलती हैं। इस दिशा में किसी भी व्यक्ति को प्रात:काल स्नान से निवृत होकर कुछ समय ईश्वरीय ध्यान में अवश्य व्यतीत करना चाहिए। ईशान कोण/पूर्व-उत्तर दिशा से घर का मुख्य प्रवेश द्वार सम्पन्नता, समृद्धि लेकर आता हैं। वास्तु शास्त्र अनुसार शिक्षार्थी अगर इस स्थान पर पूर्व या उत्तर मुख हो कर अपना शैक्षणिक अध्यन करेंगे तो अच्छे अंक अर्जित कर उत्तम व उज्जल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।

चतुर्थ सूत्र : दक्षिण-पूर्व दिशा जिसे वास्तु शास्त्र अनुसार आग्नेय कोण के नाम से जाना जाता है। आग्नेय दिशा में अग्नि का वास होना चाहिए। भवन में सुख-समर्धि के साथ अन्न-धन के भंडार रहें  इसलिए वास्तु शास्त्र अनुसार दक्षिण-पूर्व दिशा रसोई का स्थान निश्चित है। इसी दिशा में समस्त विधुत/बिजली उपकरण लगाएं। 

पंचम सूत्र : दक्षिण-पश्चिम दिशा जिसे वास्तु अनुसार नैऋत्य कोण माना गया है। इस दिशा में परिवार के मुखिया अर्थात परिवार के वरिष्ट व्यक्ति का कक्ष सबसे उत्तम वास्तु स्थान माना गया हैं। आपके घर की सीढ़ियों का निर्माण भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा के स्थान को अधिक से अधिक भरी हुई रखने का प्रयास करे, यहाँ ज्यादा खली न रखें। भंडारण कक्ष या शौचालय भी यहाँ बनाया जा सकता है। जल प्राप्ति हेतु किसी भी प्रकार का गड्ढा, अथवा जल स्थान नलकूप, बोरिंग प्रयोजन यहाँ कदापि न करे। 

षष्ठम सूत्र : उत्तर- पश्चिम दिशा को पवन देव की दिशा माना गया है, इसे वायव्य कोण माना जाता है, जिसके कारण की वायु/पवन तत्व बर्ह्माण्ड में मौजूद है। इस दिशा में भोजन कक्ष, नौकर कक्ष, अतिथि कक्ष, विवाह योग्य कन्या का कक्ष, घर के विवाहित बच्चो का कक्ष या फिर गोमाता कक्ष बनाएं। इसी दिशा में आप वाहन रखने का स्थान भी बना सकते हैं। 

तो ये तो थी वास्तु शास्त्र अनुसार कुछ जानकारी जो आपके काम आ सकती है भवन निर्माण करते वक़्त। इसी प्रकार की किसी और अन्य जानकारी के लिए आप हमारे साथ जुड़े रहिये। 

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