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Saturday, December 21, 2019

राष्ट्रीय गणित दिवस National Mathematics Day कब मनाया जाता है। Srinivas Ayangar Ramanujan jayanti

प्रिय पाठकों नमस्कार, हमारे इस वेब पोर्टल पर आपका सगत है, इस Portal पर हम Technology ओर Education से जुड़े आर्टिकल लिखते है, जो सामान्य ज्ञान और किसी भी परीक्षा की तैयारी हेतु आपके लिए बड़े ही उपयोगी और ज्ञानवर्धक होते हैं। आज के इस आर्टिकल में हम महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन जी के बारे में ओर राष्ट्रीय गणित दिवस मनाए जाने के पीछे की कहानी आपको बताएंगे। इसलिए आपसे अनुरोध है कि हमारी इस पोस्ट को पूरा पढ़ें।
राष्ट्रीय गणित दिवस National Mathematics Day कब मनाया जाता है

भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन जी के सम्मान में साल 2012 से उनके जन्मदिन 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है। श्रीनिवास अयंगर रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर, 1887 को हुआ था। इस महान विभूति का निधन 6 अप्रैल, 1920 को अल्पायु में ही टीबी की बीमारी के कारण हो गया था। वे बहुत ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। साल 2012 में उस वक़्त के मौजूद प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने 22 दिसंबर को श्री रामानुजन के सम्मान में राष्ट्रीय गणित दिवस घोषित किया था।


कोन थे श्रीनिवास अयंगर रामानुजन? Who was S Ayangar Ramanujan?
एस रामानुजन जी का जन्म मद्रास से 400 किलोमीटर दूर इरोड नामक छोटे से गांव में हुआ था। रामानुजन जी का बचपन निर्धनता व कठिनाइयों में बीता। उनके पास खुद की किताबें खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे, वो अधिकतर विद्यालय में अपने दोस्तों से किताबें मांगकर पढ़ा करते थे। उनकी रुचि गणित के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय में नहीं थी। अन्य विषयों में दिलचस्पी न होने के कारण वे बड़ी मुश्किल से ही परीक्षा पास कर पाते लेकिन गणित में वे 100 प्रतिशत अंक प्राप्त करते थे। साइंस या सामाजिक अध्यन जैसी पारंपरिक शिक्षा में रामानुजन का मन कभी भी नहीं लगा, वे ज्यादातर समय गणित में ही बिताते थे। उन्होंने दस वर्ष की उम्र में प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में सर्वोच्च अंक प्राप्त किये और आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल में उनका दाखिल हो गया। उनके गणित में इतने खो गए कि अत्यधिक गणित प्रेम ने ही उनकी शिक्षा में बाधा डाली। दरअसल, उनका गणित-प्रेम इतना बढ़ गया था कि उन्होंने अन्य विषयों को पढ़ना ही छोड़ दिया। अन्य विषयों की कक्षाओं में भी वह गणित ही पढ़ते थे और गणित के सवालों को हल किया करते थे। इसका परिणाम उनके लिए बहुत बुरा साबित हुआ। वो कक्षा 11वीं की परीक्षा में गणित को छोड़ कर बाकी सभी विषयों में फेल हो गए। इस परीक्षा में फेल होने के कारण उनको मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद हो गई। उनकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति पहले से ही ठीक नहीं थी और छात्रवृत्ति बंद हो जाने के कारण कठिनाइयां और बढ़ गई। यह दौर उनके लिए बहुत ही मुश्किलों भरा था।



अब रामानुजन जी युवा भी हो चुके थे। युवा होने पर घर की आर्थिक ओर भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए रामानुजन ने एक दफ्तर में क्लर्क की नौकरी कर ली। नोकरी करते हुए जैसे ही उनको खाली वक़्त मिलता था वो एक ख़ाली पेज लेकर उसपर गणित के सवाल हल किया करते थे। दफ्तर में जब वो किसी सवाल को हल कर रहे थे तभी एक अंग्रेज की नजर उनके इन पेजों पर पड़ गई। उस अंग्रेज ने इनके अंदर छिपे महान गणितज्ञ को पहचान लिया और अपनी निजी दिलचस्पी लेकर उन्हें ऑक्सफर्ड/Oxford विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हार्डी के पास भेजने का प्रबंध कर दिया। प्रोफ़ेसर हार्डी ने भी उनमें छिपी प्रतिभा को पहचाना। ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से उनकी ख्याति पूरे विश्व में फैल गई। प्रोफ़ेसर हार्डी ने रामानुजन के लिए कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में गणित पर शोध के लिए उनकी व्यवस्था की।

ट्रिनिटी/Trinity कॉलेज से जुड़ने के बाद से ही रामानुजन के जीवन में एक नए युग का आरंभ हुआ। रामानुजन जी का जीवन दर्पण बदलने में प्रोफ़ेसर हार्डी का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। रामानुजन ने प्रोफ़ेसर हार्डी के साथ मिल कर गणित पर कई शोधपत्र प्रकाशित किए। उनके एक विशेष शोध के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने इन्हें बी.ए./BA. की उपाधि भी दी, जो आज के समय की पीएचडी/PHD. के बराबर थी।


India's top Mathematician
वहां उनका सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन इंग्लैंड की जलवायु और रहन-सहन की शैली रामानुजन जी के वातावरण के अनुकूल नहीं थी। इसी असंतुलित वातावरण के कारण उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। उन्हें कोई बीमारी लग चुकी थी, जांच के बाद पता चला की उन्हें टी.बी. हो चुकी थी। वहां के डॉक्टरों ने उनके स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें वापस भारत लौटने की सलाह दी। भारत लौटने पर भी उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे उनकी हालत ओर ज्यादा खराब होती गई ओर आखिर में डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया।इस विलक्षण प्रतिभा के धनी ने 26 अप्रैल, 1920 को दुनिया को अलविदा कह दिया।



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