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Thursday, January 16, 2020

शास्त्रों के अनुसार स्त्रियां कितने प्रकार की होती है? यहां मिलेगी आपको पूरी जानकारी। How many types of women are as Shastra.

हमारे देश मे प्राचीन काल से ही स्त्री को देवी तुल्य माना जाता है, इनके बारे में ऐसा माना जाता है कि जिस घर में स्त्री की इज्जत होती है, और उसको सुखी रखा जाता है, उस घर में सदैव खुशहाली बनी रहती है। वहीं जिस घर में नारी का सम्मान नहीं होता और उसे पीड़ा पहुंचाई जाती है, ऐसे घर से ज्यादातर लड़ाई-झगड़ा रहता है जिसके कारण पूरा परिवार तनावग्रस्त ओर असहज रहता हैं। साथ ही उस घर के सदस्यों को बहुत सारी परेशानियों का सामना भी करना ही पड़ता है।


वास्तव में स्त्री के बहुत रूप होते है, जैसे हमारी माँ, बहन, पत्नी। लेकिन यहां हम बात करेंगे स्त्री के साथ रिश्तों से अलग उनके व्यवहार, स्वभाव, शारीरिक बनावट, मुख मुद्रा इत्यादि के हिसाब से। शास्त्रों के अनुसार किसी भी मनुष्य के शरीर की बनावट उसकी चाल-ढाल, आवाज और चरित्र से उसका भाग्य भी बताया जा सकता है। इस शास्त्र में स्त्री-पुरुष के विभिन्न प्रकार भी बताए गए हैं, लेकिन फिर भी इन शास्त्रों में स्त्रियों के लक्षणों का उल्लेख अधिक विस्तृत रूप से मिलता है। हो सकता है इसी कारण, स्त्रियों के विषय में ये कहा जाता है कि उन्हें समझना बहुत कठिन होता है। और हमारे ऋषियों ने इस विषय में उल्लेख अधिक विस्तृत रूप से किया है। स्त्रियों में साध्वी का रूप भी हो सकता है और तिया(त्रिया) चरित्र भी हो सकता है, जो उनके कार्य के हिसाब से स्वाभाविक है।


आज हम आपको प्राचीन शास्त्रों में बताए गए स्त्रियों के विभिन्न प्रकारों से अवगत करवाएंगे। इसमे आज हम इन स्त्रियों के लक्षणों के विषय में बताते हैं। शास्त्रों के अनुसार स्त्रियों को निम्न मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है। जो इस प्रकार से हैं।

प्रथम : प्रेमिणी स्त्रियों के लक्षण।
प्रेमिणी श्रेणी की स्त्रियां अत्यंत सुंदर, गौर वर्ण, चंचल नेत्र, गुलाबी पतले होंठ, सुराही जैसी गर्दन और लंबे केश की मालकिन होती हैं। इनकी सुंदरता के दीवाने सैकड़ों होते हैं। जो कोई भी एक बार इन्हें देख ले वह भूल नहीं पाता। जितना आकर्षक इनका रूप होता है, उतना सौम्य इनका स्वभाव भी होता है। इनका आचरण शुद्ध होता है। परोपकार और प्रेम की भावना इनमें प्रबल होती है। ये अपने परिवार और पति-बच्चों के लिए समर्पित होती हैं। इन्हें भोग-विलास के समस्त साधन प्राप्त होते हैं। स्वर्ण तो इन्हें विशेष प्रिय होता है।



द्वितीय : सधवा स्त्रियों के लक्षण।
शास्त्रों के अनुसार सधवा स्त्रियों के दोनों हाथ कमल के समान सुंदर होते हैं। उंगलियां सीधी होती हैं। हाथ की रेखाएं सूक्ष्म, लेकिन साफ होती हैं। हथेली चिकनी और गोलाकार होती हैं। इनके हाथ में पद्म, कानन, जयंती तथा स्वस्तिक रेखा स्पष्ट दिखाई देती हैं। भाग्य रेखा भी बिना कटी होती है। हथेली का मध्यभाग थोड़ा ऊंचा होता है। संपूर्ण शरीर का रंग एक समान दिखाई देता है। भौंहें मिली नहीं होती। दांत एक-दूसरे से चिपके होते हैं।


तृतीय : चित्रिणी स्त्रियों के लक्षण।
चित्रिणी स्त्रियां पतिव्रता, स्वजनों पर स्नेह करने वाली होती हैं। ये हर कार्य बड़ी ही शीघ्रता से करती हैं। इनमें भोग की इच्छा कम होती है। श्रृंगार आदि में इनका मन अधिक लगता है। इनसे अधिक परिश्रम वाला काम नहीं हो पाता, परंतु ये बुद्धिमान और विदुषी होती हैं। गाना-बजाना, ग्रहसज्जा और चित्रकला इन्हें विशेष प्रिय होता है। ये तीर्थ, व्रत और साधु-संतों की सेवा करने वाली होती हैं। ये दिखने में बहुत ही सुंदर होती हैं। इनका मस्तक गोलाकार, अंग कोमल और आंखें चंचल होती हैं। इनका स्वर कोयल के समान होता है। बाल काले होते हैं। इस जाति की लड़कियां बहुत कम होती हैं। यदि इनका जन्म गरीब परिवार में भी हो तो ये अपने भविष्य में पटरानी के समान सुख भोगती हैं। अधिक संतान होने पर भी इनकी लगभग तीन संतान ही जीवित रहती हैं, उनमें से एक को राजयोग होता है। इस जाति की लड़कियों की आयु लगभग 48 वर्ष होती है।

चतुर्थ : हस्तिनी स्त्रियों के लक्षण।
इस जाति की लड़कियों का स्वभाव बदलता रहता है। इनमें भोग-विलास की इच्छा अधिक होती है। ये हंसमुख स्वभाव की होती हैं और भोजन अधिक करती हैं। इनका शरीर थोड़ा मोटा होता है। ये प्राय: आलसी भी होती हैं। इनके गाल, नाक, कान और मस्तक का रंग गोरा होता है। इन्हें क्रोध अधिक आता है। कभी-कभी इनका स्वभाव बहुत क्रूर हो जाता है। इनके पैरों की उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं। इनकी संतानों में लड़के अधिक होते हैं। ये बिना रोग के ही रोगी बनी रहती हैं। इनका पति सुंदर और गुणवान होता है। अपने झगड़ालू स्वभाव के कारण ये परिवार को क्लेश पहुंचाती हैं। इनके पति इनसे दु:खी होते हैं। धार्मिक कार्यों के प्रति इनकी आस्था नहीं होती। इन्हें स्वादिष्ट भोजन पसंद होता है। इनकी आयु 73 वर्ष के लगभग होती है। विवाह के 4, 8, 12 अथवा 16वें वर्ष में इनके पति का भाग्योदय होता है। इनके कई गर्भ खंडित हो जाते हैं। इन्हें अपने जीवन में अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं, किन्तु इसका कारण भी ये स्वयं ही होती हैं। इनके दुष्ट स्वभाव के कारण ही परिवार में भी इनकी पूछ-परख नहीं होती।


पंचम : पद्मिनी स्त्रियों के लक्षण।
शास्त्र के अनुसार पद्मिनी स्त्रियां सुशील, धर्म में विश्वास रखने वाली, माता-पिता की सेवा करने वाली व अति सुंदर होती हैं। इनके शरीर से कमल के समान सुगंध आती है। यह लंबे कद व कोमल बालों वाली होती हैं। इसकी बोली मधुर होती है। पहली नजर में ही ये सभी को आकर्षित कर लेती हैं। इनकी आंखें सामान्य से थोड़ी बड़ी होती हैं। ये अपने पति के प्रति समर्पित रहती हैं। इनके नाक, कान और हाथ की उंगलियां छोटी होती हैं। इसकी गर्दन शंख के समान रहती है व इनके मुख पर सदा प्रसन्नता दिखाई देती है। पद्मिनी स्त्रियां प्रत्येक बड़े पुरुष को पिता के समान, अपनी उम्र के पुरुषों को भाई तथा छोटों को पुत्र के समान समझती हैं। ये देवता, गंधर्व, मनुष्य सबका मन मोह लेने में सक्षम होती हैं। यह सौभाग्यवती, अल्प संतान वाली, पतिव्रताओं में श्रेष्ठ, योग्य संतान उत्तपन्न करने वाली तथा आश्रितों का पालन करने वाली होती हैं। इन्हें लाल वस्त्र अधिक प्रिय होते हैं। इस जाति की लड़कियां बहुत कम होती हैं। जिनसे इनका विवाह होता है, वह पुरुष भी भाग्यशाली होता है।



षष्ठ : शंखिनी स्त्रियों के लक्षण।
शंखिनी स्वभाव की स्त्रियां अन्य स्त्रियों से थोड़ी लंबी होती हैं। इनमें से कुछ तो बहुत मोटी और कुछ बहुत ही दुर्बल होती हैं। इनकी नाक मोटी, आंखें अस्थिर और आवाज गंभीर होती है। ये हमेशा अप्रसन्न ही दिखाई देती हैं और बिना कारण ही क्रोध करती रहती हैं। ये अपने पति से रूठी रहती हैं, पति की बात मानना इन्हें गुलामी की तरह लगता है। इनका मन सदैव भोग-विलास में डूबा रहता है। इनमें दया भाव भी नहीं होता इसलिए ये परिवार में रहते हुए भी उनसे अलग ही रहती हैं। ऐसी स्त्रियां संसार में अधिक होती हैं। ऐसी लड़कियां चुगली करने वाली यानी इधर की बात उधर करने वाली होती हैं। ये अधिक बोलती हैं इसलिए लोग इनके सामने कम ही बोलते हैं। इनकी आयु लंबी होती हैं। इनके सामने ही दोनों कुल (पिता व पति) नष्ट हो जाते हैं। अंत समय में बहुत दु:ख भोगती हैं। ये उस समय मरने की बारंबार इच्छा करती हैं, लेकिन इनकी मृत्यु नहीं होती।


सप्तम : आतुरा स्त्रियों के लक्षण।
इस तरह की स्त्रियां हमेशा हड़बड़ी में ही रहती हैं। प्रत्येक कार्य को शीध्र से शीघ्र पूरा करने का इनमें जुनून होता है। इसी कारण से कई बार इनके काम बिगड़ भी जाते हैं। ये होती तो साधारण रूप-रंग वाली हैं, लेकिन पति से बहुत प्रेम करती हैं। यदि इनके मन की कोई बात पूरी न हो तो पति से लड़ाई भी कर लेती हैं। इन्हें नए-नए मित्र बनाने का स्वाभाव होता है। इनके अधिकतम मित्र स्त्री ही होते हैं। ये धन संचय करने में कमजोर होती है। अपने मित्रों पर अधिक खर्च कर बैठती हैं।


अष्ठम : पुंश्चली स्त्रियों के लक्षण।
पुंश्चली स्वभाव की लड़कियों के मस्तक का चमकीला बिंदु भी मलीन दिखाई देता है। इस स्वभाव वाली महिलाएं अपने परिवार के लिए दु:ख का कारण बनती हैं। इनमें लज्जा नहीं होती और ये अपने हाव-भाव से कटाक्ष करने वाली होती हैं। इनके हाथ में नव रेखाएं होती हैं जो सिद्ध (पुण्य, पद्म), स्वस्तिक आदि उत्तम रेखाओं से रहित होती हैं। इनका मन अपने पति की अपेक्षा पर पुरुषों में अधिक लगता है। इसलिए कोई इनका मान-सम्मान नहीं करता। सभी इनकी IP होते हैं। स्वर तीखा होता है। यदि ये किसी से सामान्य रूप से बात भी करती हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे ये विवाद कर रही हैं। इनकी भाग्य रेखा व पुण्य रेखा छिन्न-भिन्न रहती है। इनके हाथ में दो शंख रेखाएं व नाक पर तिल होता है।



नवम : डाकिनी स्त्रियों के लक्षण।
इस प्रकार की स्त्रियां मीठी-मीठी बातें करके अपना काम निकालना खूब अच्छी तरह जानती हैं। लोगों को धोखा देना इनकी प्रकृति में होता है। ये ऊपर से प्रत्येक व्यक्ति से बहुत निकटता और अपनापन दिखाती हैं लेकिन भीतर ही भीतर उन्हें धन ऐंठने की योजना बनाती रहती हैं। यहां तक कि पति को भी धोखा देने में संकोच नहीं करती। इनमें धन की विशेष लालसा होती है और धन पाने के लिए ये अपराध तक कर बैठती हैं। देखने में सुंदर, वाणी में मधुरता इनका सबसे बड़ा गुण होता है।


दशम : कृपिणी स्त्रियों के लक्षण।
ऐसी स्त्रियां कमजोर शरीर वाली, सांवली त्वचा वाली, कंजूस और निर्लज्ज होती हैं। अपनी गलत हरकतों के कारण से परिवार, समाज में बदनाम होती है। इन्हें अपनी संतान और पति से कोई मोह नहीं रहता। इस कारण इनका घर-परिवार कई बार टूट भी जाता है। प्रत्येक पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा करती हैं और धन पाने के लिए किसी भी पुरुष के साथ हो लेती हैं। इनके दिमाग में अपराध का कीड़ा भी पनपता रहता है। भोग-विलास पाने के लिए ये अपराध की राह पकड़ लेती हैं।

एकादश : स्वर्गिणी स्त्रियों के लक्षण।
ऐसी स्त्री धर्मपरायण होती है। धार्मिक कार्यों में सम्मिलित होना इन्हें प्रिय होता है। इनका परिवार व्यवस्थित रूप से चलता रहता है। न किसी वस्तु की अधिक लालसा होती है और न कुछ अधिक पाने का प्रयास करती हैं। जितना होता है उसी में खुश रहती हैं। इनका अपनी संतान से विशेष लगाव होता है। धन संचय करने का गुण इनमें होता है। इस प्रकार की स्त्रियां समाज के किसी बड़े पद पर भी देखी जाती हैं। रूप-रंग सामान्य किंतु आकर्षक होता है। ये स्त्रियां परोपकार करने में सबसे आगे रहती हैं।




द्वादश : बहुवंशिनी स्त्रियों के लक्षण।
इन स्त्रियों का रंग गेहुआं होता है और पूरी तरह से गृहस्थ धर्म को निभाने वाली होती हैं। ये कभी झूठ नहीं बोलती और मन की साफ होती हैं। पति और परिवार इनके लिए सबसे ऊपर होते हैं। ये समाज में सम्मानित होती हैं तथा उच्च पदों पर आसीन होती है। हां, इनका स्वभाव थोड़ा गर्म होता है, लेकिन जल्दी ही मान भी जाती हैं। दूसरों की बुराई करने वाले और दूसरों पर दोषारोपण करने वालों से ये दूर रहना पसंद करती हैं। ये अनेक प्रकार की संपत्तियों की मालकिन होती है। प्रेम का गुण इनमें विशेष होता है।

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